सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा के एक थाने में महिला अधिवक्ता के साथ कथित दुर्व्यवहार के मामले को गंभीरता से लेते हुए कड़ा रुख अपनाया है। इस प्रकरण में अदालत ने केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और संबंधित पुलिस अधिकारियों से जवाब तलब करते हुए यह स्पष्ट संकेत दिया है कि कानून व्यवस्था से जुड़े संस्थानों में किसी भी प्रकार की असंवेदनशीलता या दुराचार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए थाना परिसर के सीसीटीवी रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है, ताकि साक्ष्यों की निष्पक्षता बनी रहे और तथ्यों के साथ कोई छेड़छाड़ न हो सके। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि प्रारंभिक जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाएगी।
यह मामला केवल एक महिला अधिवक्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक सवाल को सामने लाता है कि क्या महिलाएं—विशेषकर कानून से जुड़ी पेशेवर महिलाएं—अपने कार्यस्थल और सार्वजनिक संस्थानों में स्वयं को सुरक्षित महसूस कर पा रही हैं। जिस स्थान को सुरक्षा और न्याय का प्रतीक माना जाता है, वहीं असुरक्षा की भावना उत्पन्न होना व्यवस्था के लिए एक गंभीर संकेत है।
शीर्ष अदालत की यह कार्रवाई यह स्पष्ट करती है कि वर्दी या पद किसी को कानून से ऊपर नहीं रखता। महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा से जुड़े मामलों में अदालतें किसी भी प्रकार की ढिलाई स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं। यह हस्तक्षेप समाज के लिए भी एक संदेश है कि लैंगिक संवेदनशीलता केवल नीतियों और दिशा-निर्देशों तक सीमित न रहकर व्यवहार में भी दिखनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख न सिर्फ महिला अधिवक्ताओं का विश्वास मजबूत करता है, बल्कि हर उस महिला के लिए आश्वासन है जो न्याय की अपेक्षा के साथ व्यवस्था के पास जाती है। यह स्पष्ट संकेत है कि न्याय प्रणाली महिलाओं की गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए सजग और प्रतिबद्ध है।
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